Friday, February 20, 2026

निजी शिक्षण संस्थानों की चमकती तस्वीर : धुंधली सच्चाई

भारत में उच्च शिक्षा का क्षेत्र पिछले दो दशकों में  बहुत तेजी से बदला है। सरकारी संस्थानों की सीमित सीटों और बढ़ती जनसंख्या के कारण निजी कॉलेज, विश्वविद्यालय और संस्थानों का विस्तार हुआ। इन संस्थानों ने आधुनिक भवन, स्मार्ट क्लास, विदेशी सहयोग, 100% प्लेसमेंट और विश्वस्तरीय सुविधाओं के दावे करके विद्यार्थियों और अभिभावकों को आकर्षित किया। विज्ञापन, ब्रोशर और वेबसाइटों में सब कुछ अत्यंत आकर्षक दिखता है—परंतु जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों से अलग होती है।


1. 100% प्लेसमेंट का दावा : आंकड़ों की बाज़ीगरी

आज अधिकांश निजी शिक्षण संस्थान अपने प्रचार में “100% प्लेसमेंट” को सबसे बड़ा हथियार बनाते हैं। परंतु इस दावे की वास्तविकता को समझना आवश्यक है। कई बार संस्थान अल्पकालिक इंटर्नशिप, कम वेतन वाली नौकरियों, या असंबंधित क्षेत्रों में नियुक्ति को भी प्लेसमेंट में शामिल कर लेते हैं। कई जगह विद्यार्थियों को केवल ऑफर लेटर दिखाकर प्लेसमेंट घोषित कर दिया जाता है, भले ही छात्र जॉइन न करे या कंपनी बाद में नियुक्ति रद्द कर दे।
कुछ संस्थानों में विद्यार्थियों को दबाव देकर छोटे स्टार्टअप या कॉल सेंटर जॉइन करवाए जाते हैं ताकि संस्थान का प्लेसमेंट प्रतिशत बना रहे। इस प्रकार प्लेसमेंट एक शिक्षा परिणाम नहीं बल्कि मार्केटिंग टूल बनकर रह गया है।

2. एक्रेडिटेशन और रैंकिंग की विश्वसनीयता पर सवाल

भारत में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कई संस्थाएं कार्यरत हैं, जैसे National Assessment and Accreditation Council, University Grants Commission और All India Council for Technical Education। इनका उद्देश्य शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता, शोध, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था का मूल्यांकन करना है।
परंतु कई बार देखने में आता है कि A++, A+ या अन्य उच्च ग्रेड प्राप्त संस्थानों की वास्तविक स्थिति उस स्तर की नहीं होती। कागजों पर शोध, सुविधाएं, स्टाफ संख्या और शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावशाली दिखती हैं, लेकिन वास्तविकता में संसाधनों का उपयोग सीमित या प्रतीकात्मक होता है। कुछ संस्थान निरीक्षण से पहले अस्थायी रूप से उपकरण खरीद लेते हैं, अतिरिक्त फैकल्टी को अस्थायी रूप से नियुक्त कर लेते हैं या रिकॉर्ड तैयार कर लेते हैं। निरीक्षण समाप्त होते ही व्यवस्थाएं पहले जैसी हो जाती हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या गुणवत्ता मूल्यांकन केवल दस्तावेज़ आधारित रह गया है?

3. उच्च फीस, कम वेतन – शिक्षा का व्यापारिक मॉडल 

निजी संस्थानों की फीस लगातार बढ़ रही है। कई कॉलेज अपने शुल्क निर्धारण में सातवें वेतन आयोग, आधुनिक सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा का हवाला देते हैं। परंतु यही संस्थान अपने शिक्षकों और कर्मचारियों को उस स्तर का वेतन नहीं देते। फैकल्टी से अपेक्षा की जाती है कि वे शोध करें, प्रोजेक्ट लाएं, छात्रों को प्रशिक्षित करें, एडमिशन बढ़ाएं और संस्थान की छवि सुधारें, परंतु वेतन अक्सर न्यूनतम स्तर पर होता है। कई संस्थानों में वेतन समय पर नहीं मिलता, पीएफ या अन्य लाभ अधूरे रहते हैं और नौकरी की स्थिरता भी नहीं होती। इस असंतुलन का परिणाम यह होता है कि योग्य शिक्षक निजी संस्थानों से जल्दी बाहर निकल जाते हैं या केवल अनुभव लेने के लिए काम करते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है, क्योंकि स्थायी और अनुभवी शिक्षकों का अभाव हो जाता है।

4. अनुबंध आधारित नियुक्ति : असुरक्षा का माहौल

आज अधिकांश निजी शिक्षण संस्थान स्थायी नियुक्तियों से बचते हैं। फैकल्टी और स्टाफ को अनुबंध पर रखा जाता है, जिसे कभी भी समाप्त किया जा सकता है। इसका प्रभाव दो स्तरों पर पड़ता है: शिक्षक अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित रहते हैं। वे संस्थान की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने से डरते हैं। जब शिक्षक स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पाते, तब शिक्षा केवल औपचारिकता बन जाती है। शोध, नवाचार और अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है। 

5. पुराने कर्मचारियों को हटाने की प्रवृत्ति

कुछ संस्थानों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि जैसे ही कर्मचारी स्थायी लाभों—जैसे ग्रेच्युटी, प्रोविडेंट फंड या अन्य सुविधाओं—के पात्र होने लगते हैं, उन्हें किसी न किसी कारण से हटा दिया जाता है। यह न केवल कर्मचारी अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि संस्थान की नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। शिक्षा संस्थान केवल ज्ञान देने के केंद्र नहीं होते, वे सामाजिक मूल्यों के प्रतीक भी होते हैं। यदि वहीं शोषण हो, तो समाज में गलत संदेश जाता है।

6. पढ़ाई से अधिक इवेंट मैनेजमेंट

आज कई निजी संस्थानों में शैक्षणिक गतिविधियों से अधिक ध्यान इवेंट्स, फेस्ट, सेमिनार और फोटो सेशन पर होता है। यह सही है कि सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं, परंतु जब वे शिक्षा का स्थान ले लें, तब समस्या पैदा होती है। कई संस्थानों में शिक्षक का मूल्यांकन पढ़ाने से अधिक इस आधार पर होता है कि उन्होंने कितने कार्यक्रम आयोजित किए या सोशल मीडिया पर संस्थान की कितनी प्रचार सामग्री डाली।
इससे शिक्षा की मूल भावना प्रभावित होती है। छात्र भी ज्ञान के बजाय प्रमाणपत्र और इवेंट अनुभव को अधिक महत्व देने लगते हैं।

7. गुणवत्ता बनाम लाभ – बदलता उद्देश्य

शिक्षा का मूल उद्देश्य समाज का बौद्धिक और नैतिक विकास है। परंतु कई निजी संस्थानों के लिए शिक्षा अब निवेश और लाभ का साधन बन गई है। जब शिक्षा व्यवसाय बनती है, तब छात्र ग्राहक बन जाते हैं , शिक्षक कर्मचारी बन जाते हैं  और ज्ञान उत्पाद बन जाता है। इस मॉडल में गुणवत्ता से अधिक महत्व ब्रांड, विज्ञापन और प्रवेश संख्या को दिया जाता है।

8. छात्रों पर प्रभाव

इन परिस्थितियों का सबसे अधिक असर छात्रों पर पड़ता है। उन्हें महंगी शिक्षा मिलती है पर गुणवत्ता सीमित रहती है। प्लेसमेंट अनिश्चित रहता है, व्यावहारिक ज्ञान कम मिलता है, जब छात्र शिक्षा में निवेश करते हैं, तो वे भविष्य की उम्मीद भी करते हैं। यदि संस्थान केवल प्रमाणपत्र दे और कौशल न दे, तो यह युवाओं के साथ अन्याय है।

9. समाधान क्या हो सकते हैं?

इस स्थिति को सुधारने के लिए कई कदम आवश्यक हैं:
(1) पारदर्शी प्लेसमेंट रिपोर्ट संस्थानों को वेतन, कंपनी और भूमिका सहित वास्तविक प्लेसमेंट डेटा सार्वजनिक करना चाहिए।
(2) निरीक्षण की वास्तविक प्रक्रिया एक्रेडिटेशन संस्थाओं को आकस्मिक निरीक्षण, छात्र और शिक्षक फीडबैक तथा डिजिटल ट्रैकिंग का उपयोग करना चाहिए।
(3) शिक्षक अधिकारों की सुरक्षा स्थायी नियुक्ति, समय पर वेतन और सामाजिक सुरक्षा लाभ अनिवार्य किए जाने चाहिए।
(4) फीस और सुविधाओं का संतुलन यदि संस्थान उच्च फीस लेते हैं, तो उन्हें उसी स्तर की शिक्षा और वेतन व्यवस्था भी देनी चाहिए।
(5) शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सामाजिक दायित्व मानना सरकार, समाज और शिक्षा क्षेत्र को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ न हो।

निष्कर्ष

निजी शिक्षण संस्थानों ने भारत में शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु जब शिक्षा केवल दिखावे, रैंकिंग और मुनाफे तक सीमित हो जाए, तब उसकी आत्मा खो जाती है।
जरूरत इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता को पुनः स्थापित किया जाए। एक अच्छा संस्थान वह नहीं जो केवल A++ ग्रेड ले आए, बल्कि वह है जो अपने छात्रों को ज्ञान, अपने शिक्षकों को सम्मान और समाज को जिम्मेदार नागरिक दे सके।


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